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सुकून-ए-दीदार
प्रेम
1 min read 2026-09-12
तुम्हारी एक झलक पे मुझे सुकून मिलता है,
आओ कभी मिलकर एक नया जहां आबाद करते हैं।
तुम्हारी हर बात से दिल को करार मिलता है,
आओ कभी हम पास बैठ कर गूफ्तगू करते हैं।
तुम्हारी एक खुशी में हम ख़ुद राफ्ता हो जाते हैं,
आओ कभी की इस हंसी पे हम ऐतबार करते हैं।
तुम्हारी ये झुमके साड़ी का शहर हमें बेताब करता है,
तुम्हारी वो पुरानी बातें सुननी है,कैसी हो,
आओ कभी सच में है हम गुम होने की आस करते हैं।
सुनो है तुम्हारी शोखियाँ बढ़ती जा रही हैं
आओ कभी हमें भी तुम्हारी उस तबस्सुम का शरीक ए हयात बनाना है।
फ़क़त तमन्ना इतनी है कि
आओ कभी मेरे आंखों का नूर और दिल के करार बनाने ।
देखा हमने तुम्हे रश्क-ए-क़मर हो तुम,
आओ कभी अब दीदार-ए-महताब को और कितना तरसना है।.........
(बस हसरत इतनी है कि तुम दिल की तस्कीन बन जाओ,
छोड़कर चाँद को पीछे, मेरी आँखों का नूर-ए-यकीन बन जाओ।)
— Anant Yadav
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